रोजा रखने की दुआ: अरबी व हिंदी में पाठ और महत्व

परिचय: रोजा रखने की दुआ का महत्व
रोजा रखने की दुआ मुसलमानों के लिए रमजान और अन्य रोजों में नीयत (इरादा) दर्ज करने का प्रतीक है। नीयत दिल में की जाती है, पर कई समुदायों में धार्मिक अनुष्ठान की स्पष्टता और ध्यान के लिए दुआ का मौखिक पाठ भी किया जाता है। यह दुआ इबादत की नीयत को स्पष्ट करती है और उपवास के आध्यात्मिक उद्देश्य को याद दिलाती है।
मुख्य बातें: दुआ, पाठ और संदर्भ
नीyyat (इरादा) और उसकी शर्तें
अधिकारिक फिक्ही मतों में रोजा की नीयत दिल में करना काफ़ी माना जाता है; इसका मतलब है कि किसी विशेष समय पर मन में यह ठान लेना कि आप आज रोजा रखेंगे। मौखिक दुआ का पाठ परंपरा के अनुसार सहायक है, पर आवश्यक नहीं।
आम तौर पर प्रयुक्त दुआ (ट्रांसलिटरेशन और हिंदी अर्थ)
कई समुदायों में जो दुआ रोजा रखने से पहले कही जाती है, उसका एक सामान्य रूप निम्न है (ट्रांसलिटरेशन):
‘Nawaitu sawma ghodin an ada’i farddi Ramadan hadha lillahi taala’
हिंदी अर्थ: ‘मेरी नीयत है कि मैं कल का रोजा रामज़ान के इस फर्ज़ के तौर पर अल्लाह के लिए रखूंगा।’
दूसरा सामान्य वाक्यांश सरल और संक्षिप्त है: ‘नैयेति अन असूमा’ — जिसका मतलब है ‘मैं रोजा रखने की नीयत करता/करती हूँ।’
तोड़े जाने पर पढ़ी जाने वाली दुआ
इफ्तार के समय अक्सर कहा जाने वाला एक सामान्य ज़ुबानी वाक्य है: ‘Allahumma inni laka sumtu wa bika aamantu wa ‘ala rizq-ika-aftartu’ — हिंदी अर्थ: ‘हे अल्लाह, मैं तेरे लिए रोजा रखा और तेरी रज़ा पर रिफ्ता कर के खोल रहा/रही हूँ।’
निष्कर्ष: पाठ का महत्व और पाठकों के लिए सुझाव
रोजा रखने की दुआ का प्राथमिक उद्देश्य इरादे की पुष्टि और आध्यात्मिक जुड़ाव है। धार्मिक शिक्षाओं के अनुसार, नीयत दिल से साफ़ हो तो रोजा मान्य होता है; मौखिक दुआ इसे और स्पष्ट कर देती है। पाठकों को सलाह है कि वे अपनी स्थानीय धार्मिक परंपरा और विश्वसनीय धार्मिक स्रोतों से मार्गदर्शन लें, तथा नीयत को मन में रखकर रोजा रखें। आने वाले रोजों में यह समझ कर कि नीयत का मूल उद्देश्य ईमानदारी और समर्पण है, दुआ और उपवास की पाइयाद को और meaningful बनाया जा सकता है।







