होली कब है: तिथि, महत्व और कैसे निर्धारित होती है

परिचय — होली का महत्व और प्रासंगिकता
होली भारतीय उपमहाद्वीप का प्रमुख वसंत पर्व है, जो रंगों, मेल-जोल और सामाजिक पुनर्संयोजन का प्रतीक है। यह त्योहार किसानों के लिए फसल चक्र के बदलते मौसम और व्यापक सांस्कृतिक उत्सव का संकेत देता है। हर वर्ष मिलने वाली छुट्टियों, यात्रा योजनाओं और सामुदायिक आयोजनों के कारण इसे जानना नागरिकों, संस्थानों और व्यवसायों के लिए प्रासंगिक होता है।
मुख्य भाग — होली कब और कैसे तय की जाती है
वैज्ञानिक और पौराणिक आधार
पौराणिक दृष्टि से होली बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, जिसमें होलिका दहन और रंगों वाली धुलेंडी जैसी परंपराएँ जुड़ी हैं। खगोलीय दृष्टि से होली हिंदू चन्द्र कैलेंडर के फाल्गुन माह की पूर्णिमा (पार्वण/पूर्णिमा) के दिन मनाई जाती है। इसलिए ग्रेगोरियन कैलेंडर में इसकी तिथि वर्ष-दर-वर्ष बदलती रहती है और आमतौर पर फरवरी से मार्च के बीच आती है।
दिन और स्थानीय भिन्नताएँ
होली के मुख्य दो चरण होते हैं: पहली रात को होलिका दहन (या छोटी होली) और अगले दिन रंगों की होली (धुलेंडी, रंगवाली होली)। कुछ क्षेत्रों में रंग खेलने का मुख्य दिन भिन्न हो सकता है — जैसे कि 일부 स्थानों पर लठमार होली या रँग पंचमी जैसी स्थानीय परंपराएँ भी जुड़ी होती हैं। सार्वजनिक छुट्टियाँ और आयोजन स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकारों के द्वारा घोषित किए जाते हैं, इसलिए स्थान के अनुसार बदलाव देखे जा सकते हैं।
तिथियाँ कैसे जानी जाएँ
किसी विशेष वर्ष में होली कब है यह जानने के लिए स्थानीय पञ्चांग, हिंदू कैलेंडर या सरकारी छुट्टी सूची देखें। ऑनलाइन पञ्चांग और नजदीकी मंदिर/समुदाय केंद्र भी सटीक समय (जैसे पूर्णिमा की तारीख और होलिका दहन का कठिन समय) बताते हैं। ध्यान रखें कि चांद निकलने और स्थानीय समयानुसार तिथियाँ बदल सकती हैं।
निष्कर्ष — पाठकों के लिए सार और सुझाव
संक्षेप में, होली हर वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा को आती है और सामान्यतः यह फरवरी-मार्च में पड़ता है। विशेष तिथि जानने के लिए अपने स्थानीय पञ्चांग या आधिकारिक छुट्टी घोषणा देखना सबसे विश्वसनीय तरीका है। त्योहार सामाजिक मेल-जोल और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का अवसर है; इसलिए योजना बनाते समय स्थानीय नियम, सुरक्षा और पर्यावरण-हितैषी प्रथाओं को ध्यान में रखना उपयोगी रहेगा।









