সোমবার, জানুয়ারি 26

यूजीसी की नई नियमावली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यूजीसी के निर्देश

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परिचय: विषय की प्रासंगिकता

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यूजीसी भारत सरकार का एक प्रमुख सांविधिक निकाय है जो देश के उच्च शिक्षा संस्थानों को विनियमित करने और उच्च मानक बनाए रखने में भूमिका निभाता है। स्रोतों के अनुसार, यूजीसी की स्थापना आजादी से पहले हुई मानी जाती है। हालिया नियमावली के बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये उच्च शिक्षा परिसरों में समानता, समावेशन और अनुशासन से सीधे जुड़े हैं, तथा छात्रों और संस्थानों दोनों के लिये प्रभाव डाल सकती हैं।

मुख्य घटनाक्रम और नियमावली के मुख्य बिंदु

जाति-आधारित भेदभाव रोकने के उपाय

यूजीसी ने देशभर के उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिये नई नियमावली अधिसूचित की है। इस नियमावली के तहत प्रत्येक परिसर में समानता समितियाँ (इक्विटी कमेटी) का गठन अनिवार्य कर दिया गया है। नियमों के पालन में चूक करने पर संस्थान को डिग्री या किसी कार्यक्रम की अनुमति देने से रोका जा सकता है, जिससे अनुशासनात्मक दंड लागू हो सकेंगे।

मसौदे से अंतिम रूप तक के बदलाव

यूजीसी ने प्रारम्भ में एक मसौदा संस्करण सार्वजनिक सुझावों के लिये जारी किया था। मसौदे में कुछ विवादास्पद बातें भी थीं: प्रारम्भिक मसौदा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को जाति-आधारित भेदभाव के दायरे से बाहर रखता दिखा और भेदभाव की परिभाषा अस्पष्ट थी। बाद में यूजीसी ने इन बिंदुओं में संशोधन कर OBC को भेदभाव के दायरे में शामिल किया और झूठी शिकायतों से संबंधित कुछ प्रावधान हटा दिए। साथ ही, ‘भेदभाव’ की परिभाषा को थोड़ा विस्तारित कर वर्ष 2012 के विनियमों में निहित कुछ भाषा को शामिल किया गया है।

निष्कर्ष और संभावित प्रभाव

नयी नियमावली से संस्थानों को समावेशी नीतियाँ लागू करने और शिकायत निवारण तंत्र मजबूत करने की आवश्यकता पैदा होगी। नियमों का पालन न करने पर दंड के प्रावधान संस्थागत व्यवहार में बदलाव लाने का यंत्र हो सकते हैं। छात्रों और कर्मचारियों के लिये यह कानूनी सुरक्षा के साथ-साथ संस्थागत जवाबदेही बढ़ाने का संकेत है। आगे देखा जाना है कि नियमों के क्रियान्वयन, शिकायत निवारण और प्रशिक्षण/जागरूकता कार्यक्रमों से वास्तविक जमीन पर क्या परिणाम निकलते हैं।

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