বুধবার, জানুয়ারি 28

भारत के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू — जीवन, भूमिका और प्रभाव

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परिचय: विषय का महत्व और प्रासंगिकता

president of india का पद गणतंत्र भारत के संवैधानिक ढांचे में महत्वपूर्ण है। वर्तमान राष्ट्रपति, श्रीमती द्रौपदी मुर्मू, 25 जुलाई 2022 को राष्ट्र के 15वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लीं। उनकी नियुक्ति न केवल औपचारिक संवैधानिक भूमिका का प्रतिनिधित्व करती है बल्कि सामाजिक समावेशन, जनजातीय प्रतिनिधित्व और महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रतीक के रूप में भी देखी जाती है। इससे देश की विविधता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मजबूती पर चर्चा तेज होती है।

मुख्य भाग: तथ्य और घटनाएँ

व्यक्तिगत पृष्ठभूमि और प्रारंभिक जीवन

द्रौपदी मुर्मू का जन्म 20 जून 1958 को उपरबेड़ा, मईूरभंज जिले, ओड़िशा में एक संथाल जनजातीय परिवार में हुआ था। शुरुआती जीवन आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से भरा रहा, पर शिक्षा के प्रति उनकी आस्था और जमीनी अनुभव ने उन्हें सार्वजनिक सेवा की ओर प्रेरित किया।

कैरियर और राजनीति

1979 से 1983 तक उन्होंने ओड़िशा सरकार के सिंचाई व विद्युत विभाग में जूनियर असिस्टेंट के रूप में सेवा की। 2000 में वे रायरंगपुर निर्वाचन क्षेत्र से ओड़िशा विधान सभा की सदस्य चुनी गईं और 2009 तक दो कार्यकालों तक इस पद पर रहीं। 18 मई 2015 को उन्हें झारखंड का राज्यपाल नियुक्त किया गया, जहां से उनका संवैधानिक अनुभव और सार्वजनिक सेवा का दायरा बढ़ा।

राष्ट्रपति के रूप में प्रमुख दृष्टिकोण

राष्ट्रपति बनने के बाद, श्रीमती मुर्मू ने शिक्षा, विशेषकर पिछड़े और हाशिए पर रहने वाली महिलाओं तथा लड़कियों के सशक्तिकरण की आवश्यकता पर जोर दिया है। वे जनजातीय सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण और प्रचार की सक्रिय समर्थक रही हैं और देशभर में भ्रमण कर विभिन्न सामाजिक पहलुओं पर संवाद करती रही हैं। वे कई जनजातीय शैक्षिक तथा सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़ी रहीं।

पारिवारिक जानकारी

उनकी एक बेटी, श्रीमती इतिश्री मुर्मू, और दामाद श्री गणेश हेम्ब्राम (जो एक रग्बी खिलाड़ी हैं) परिवार में शामिल हैं।

निष्कर्ष: महत्व और आगे की अपेक्षाएँ

द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति पद भारतीय लोकतंत्र में प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों मायनों में महत्वपूर्ण है। उनकी पृष्ठभूमि और अनुभव नीतिगत विमर्श में सामाजिक समावेशन और शिक्षा पर और ध्यान देने का संकेत देता है। भावी प्रवृत्तियाँ यह दिखा सकती हैं कि संवैधानिक पदों पर आने वाले प्रतिनिधि समाज के व्यापक तबकों के मुद्दों को अधिक प्रमुखता देंगे, जिससे नीतिगत विमर्श में विविधता और समावेशन को बल मिलेगा। पाठकों के लिए यह जानना उपयोगी है कि राष्ट्रपति का पद राज्य की एकता और संवैधानिक मूल्यों के रखवाले के रूप में बना रहेगा, जबकि व्यक्तिगत अनुभव और दृष्टिकोण सार्वजनिक संवाद को आकार देंगे।

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