বৃহস্পতিবার, এপ্রিল 9

थोरियम (thorium): भारत के संसाधन, उपयोग और चुनौतियाँ

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परिचय: थोरियम का महत्व और प्रासंगिकता

थोरियम (thorium) प्रकृति में पाया जाने वाला एक रेडियोधर्मी धातु तत्व है (प्रतीक Th, परमाणु संख्या 90)। इसकी खोज 1828 में जोन्स जेकॉब बर्जेलियस ने की थी और इसका नाम नॉर्डिक देवता थोर के नाम पर रखा गया। थोरियम को भविष्य के नाभिकीय ईंधन के रूप में देखा जाता है क्योंकि यह पृथ्वी की पपड़ी में यूरेनियम की तुलना में अधिक प्रचुरता से मिलता है और कई देशों के लिए स्वदेशी ऊर्जा विकल्प की संभावना प्रस्तुत करता है।

मुख्य तथ्य और वर्तमान स्थिति

भौतिक व रासायनिक गुण

थोरियम का प्रमुख प्राकृतिक समस्थानिक Th-232 है, जिसका अर्ध-आयु लगभग 1.405×1010 वर्ष है। यह स्वयं फिशले नहीं है पर नाभिकीय चक्र में बेरियार्डिंग प्रक्रियाओं द्वारा यूरेनियम-233 में परिवर्तित किया जा सकता है, जो विभाजनशील होता है।

उपयोग और भंडार

इतिहास में थोरियम का उपयोग गैस लैंप के मैंटल, कैमरा लेंस और कुछ औद्योगिक अनुप्रयोगों में हुआ है। आज इसकी प्रमुख नीतिगत चर्चा नाभिकीय ईंधन चक्र में इसकी संभावित भूमिका को लेकर है। भारत के पास मोनाजाइट-समृद्ध समुद्री तटों (केरल, तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र) में बड़े थोरियम संसाधन माने जाते हैं, और देश की तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा रणनीति में थोरियम पर विशेष ध्यान है।

लाभ और चुनौतियाँ

थोरियम-आधारित प्रणालियाँ कुछ लाभ देती दिखती हैं: संसाधन की उपलब्धता, लंबे समय तक टिकने वाली ईंधन आपूर्ति और पारंपरिक ईंधन की तुलना में कुछ हटकर कचरा रूप। परन्तु चुनौतियाँ भी महत्वपूर्ण हैं — थोरियम को fissile सामग्री में बदलने के लिए प्रौद्योगिकी व ब्रीडिंग चक्र चाहिए, प्रॉसेसिंग और रिउपयोग के तकनीकी व आर्थिक मुद्दे हैं, तथा U-233 के संभावित प्रसार संबंधी चिंताएँ भी मौजूद हैं।

निष्कर्ष और भविष्य का परिदृश्य

थोरियम (thorium) को कम-कार्बन ऊर्जा भविष्य में उपयोगी विकल्प माना जा रहा है, विशेषकर उन देशों के लिए जिनके पास घरेलू थोरियम रिजर्व हैं। वैश्विक और भारतीय अनुसंधान, जैसे कि molten salt reactors और उन्नत ब्रीडर प्रौद्योगिकियाँ, इस क्षेत्र के विकास पर निर्भर करेंगे। हालांकि वाणिज्यिक स्तर पर व्यापक उपयोग के लिए और निवेश, नियामक ढाँचा तथा तकनीकी पारदर्शिता की आवश्यकता है। पाठकों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि थोरियम को एक संभावित समाधान के रूप में देखा जाए, न कि तत्काल व सार्वभौमिक विकल्प के रूप में—इसके दीर्घकालिक फायदे और सीमाएँ शोध व नीति पर निर्भर रहेंगी।

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