अष्टमी पर्व: महत्व, रीति-रिवाज और अर्थ

अष्टमी पर्व का महत्व
अष्टमी, हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो विशेष रूप से देवी दुर्गा के प्रारंभिक पूजा का दिन माना जाता है। यह पर्व नवरात्रि के दौरान मनाया जाता है और इसे माता की आराधना के लिए समर्पित किया जाता है। अष्टमी का दिन विशेष रूप से मातृ शक्ति की आराधना का होता है। यह दिन माँ दुर्गा की विशेष पूजा एवं वन्य जीवों के सम्मुख भोग अर्पण करने का भी दिन है।
अष्टमी का इतिहास
इस दिन का इतिहास प्राचीन धर्मग्रंथों में भी उल्लेखित है। मान्यता है कि अष्टमी के दिन माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था। यही कारण है कि इस दिन शक्ति की पूजा की जाती है। नवरात्रि के आधिकारिक आरम्भ से पहले, लोग इस दिन उपवास रखते हैं और देवी दुर्गा की प्रतिमा की विशेष पूजा करते हैं।
अष्टमी का उपवास और रीति-रिवाज
अष्टमी के दिन भक्तजन उपवास करते हैं और रात्रि को देवी दुर्गा की आरती करते हैं। इस दिन कई लोग कन्या पूजन भी करते हैं, जहां नौ कन्याओं को आमंत्रित कर उन्हें भोजन कराया जाता है। यह परंपरा कन्याओं में देवी का दर्शन करना और उनकी पूजा करना दर्शाती है। अष्टमी के दिन विशेष रूप से चंदन, फूल और फल आदि का भोग अर्पित किया जाता है।
अष्टमी की आधुनिक प्रासंगिकता
आधुनिक समय में भी अष्टमी का पर्व अपनी महत्ता बनाए रखता है। लोग इस दिन अपने परिवार और मित्रों के साथ मिलकर देवी की आराधना करते हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि आत्मिक शांति और स्नेह के बंधन को मजबूत बनाने का भी अवसर प्रदान करता है। समाज में एकता और भाईचारे का संचार इस दिन देखने को मिलता है।
निष्कर्ष
अष्टमी पर्व का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अनमोल है। यह न केवल देवी दुर्गा की आराधना का दिन है, बल्कि यह सृष्टि में नारी शक्ति के प्रति सम्मान और श्रद्धा भी व्यक्त करता है। इस पर्व से हम यह संदेश लेते हैं कि जीवन में शक्ति का स्थान सर्वोपरि है। भविष्य में भी अष्टमी का पर्व हमारे जीवन में एक नई ऊर्जा और प्रेरणा देता रहेगा।